महान आयुर्वेदिक लूट ! - 9
नौवाँ भाग: निर्देश का अंत
मरीज़ शून्य अब भी अपनी रसोई में है। गिलास का बर्तन। साफ कपड़ा। घी का चम्मच। चार जड़ी-बूटियाँ – मुस्ता, सारिवा, मंजिष्ठा, पुनर्नवा। और कभी-कभी आधी सिंघनाद गुग्गुल, जिसे वह पीसकर पानी में उबालता है, छानता है, घी मिलाता है, और पीता है।
कोई QR code स्कैन नहीं करता। कोई 10% डिस्काउंट नहीं लेता। कोई "ग्राहक सेवा" नंबर नहीं बुलाता।
बस उबाल, छान, घी डाल, पी। और नोट करता रहे – पेशाब का रंग, गर्दन का दर्द, साँसें, नींद, गुस्सा, आँखों के नीचे का कालापन, पसीने की बू, मल का ढीलापन या सख्ती।
वह ठीक नहीं हुआ। पर वह अब सिस्टम का ग्राहक नहीं है। उसने सदस्यता रद्द कर दी। उसने चिकित्सीय निर्देश लेना बंद कर दिया – वे निर्देश जो कभी उसे कहीं नहीं ले गए, सिर्फ दूसरे निर्देश के पास, और दूसरे के पास, और दूसरे के पास।
वह जानता है कि असली निर्देश बिकता नहीं। असली निर्देश केवल उबलता है – किसी की रसोई में, किसी के हाथों से, किसी के शरीर के लिए। बिना किसी लेबल के। बिना किसी QR code के। बिना किसी 10% डिस्काउंट के।
चोट खुली है। अब खून बहेगा। पर खून बहने के बाद ही नया ऊतक बनता है। मरीज़ शून्य उसी प्रक्रिया में है – बिना सरलीकरण के, बिना व्यावसायिक काट-छाँट के, बिना बिल के।
और यही सबसे बड़ा व्यंग्य है: दवा अब भी मौजूद है। बस बिकाऊ नहीं है। असली चिकित्सीय निर्देश अब भी मौजूद है। बस QR code पर नहीं मिलता।
समाप्त।
(यह लेख किसी खास व्यक्ति, संस्था या उत्पाद का नाम नहीं लेता। यह एक मरीज़ का दृष्टिकोण है – निदान या उपचार सलाह नहीं।)
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