महान आयुर्वेदिक लूट ! - 2
दूसरा भाग: 'सरलीकरण का षड्यंत्र'
बिना जलन के दवा नहीं बनती। बिना ताप के संस्कार नहीं होता। लेकिन आज के "सरलीकरण" का मतलब है: फायदे के लिए प्रक्रिया को काटना, फिर भी दावा करना कि दवा वही है।
असली फार्मूला कैसे बनता था, सुनो।'
कोई ऋषि – मान लो नाम "आचार्य अमुक" – चालीस साल लगाता है। प्रकृति देखता है, अपने शरीर पर जड़ी-बूटियाँ परखता है, और एक फार्मूला बनाता है। पाँच जड़ी-बूटियाँ। एक अनुपात – बिल्कुल सटीक। एक प्रक्रिया – धोना, भिगोना, उबालना, राख बनाना, और आखिरी में निश्चन्द्रीकरण – वह अंतिम चरण जो भस्म को तेज़ और घातक होने से बचाता है। एक अनुपान – दूध, घी, शहद। एक समय – सुबह, दोपहर, शाम, जब दोष ठीक उसी समय जागते हैं। एक अवधि – सात दिन, इक्कीस दिन, छः सप्ताह, जितने दिन में आम पिघले।
यह फार्मूला कोई नुस्खा नहीं था। यह एक हथियार था। एक बीमारी के खिलाफ।
अब दो हज़ार साल बाद। एक कंपनी उसी फार्मूले को बनाने बैठती है। पर दिक्कतें हैं: असली प्रक्रिया में चालीस घंटे लगते हैं, उसमें हुनर चाहिए, महँगी जड़ी-बूटियाँ चाहिए, और – सबसे बड़ी दिक्कत – असली दवा बहुत जल्दी असर करती है, जिससे मरीज़ को दोबारा खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ती। घाटा।
तो कंपनी सरलीकरण करती है।
मुश्किल से मिलने वाली जड़ी-बूटी निकालो, उसकी जगह सस्ता स्थानीय विकल्प डालो। कड़वी जड़ी-बूटी निकालो – ग्राहक शिकायत करते हैं। प्रिज़र्वेटिव डालो, चमकदार कोटिंग लगाओ। निश्चन्द्रीकरण – जो अंतिम कदम है – हटा दो। उसमें समय लगता है, मुनाफा कम होता है।
प्रक्रिया को चालीस घंटे से घटाकर चालीस मिनट कर दो।
अब वही नाम है। वही लेबल है। वही दावा है – "शास्त्रीय फार्मूला"।
लेकिन अब वह फार्मूला नहीं रहा। वह एक चिकित्सीय निर्देश है। निर्देश पर छपा है QR code – वह कोड तुम्हें ले जाता है एक और वेबसाइट, जहाँ वही निर्देश 10% छूट पर बिक रहा है।
मरीज़ शून्य यह जान गया। उसकी गर्दन ने जान लिया – हर बार जब उसने सूंठ खाई, गर्दन में ऐसा दर्द उठा जैसे कोई कील ठोंककर आधी छोड़ आया हो। उसके गुर्दे ने जान लिया – हर बार पित्तपापड़ा खाने पर पेशाब संतरी हो जाता था और जलन भीतर तक खा जाती थी। उसकी त्वचा ने जान लिया – हर बार धनिया लगते ही ऊतकों में पानी जम जाता था, मानो शरीर किसी ऊँट की तरह सोख लेता हो और छोड़ने को राजी ही न हो।
यह सब "सरलीकृत" फार्मूले थे। वे 95% लोगों के लिए ठीक हो सकते हैं। पर मरीज़ शून्य और उस जैसे 5% के लिए – वे ज़हर हैं। क्योंकि प्रक्रिया ही दवा थी। प्रक्रिया के बिना केवल निर्देश बचता है – और वह निर्देश किसी काम का नहीं।
(यह लेख किसी खास व्यक्ति, संस्था या उत्पाद का नाम नहीं लेता। यह एक मरीज़ का दृष्टिकोण है – निदान या उपचार सलाह नहीं।)
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